डिंडौरी(संतोष सिंह राठौर )-:आजाद अध्यापक शिक्षक संघ के बैनर तले रविवार को डिंडौरी पोस्ट ऑफिस के सामने सैकड़ों शिक्षकों ने TET के विरोध में एकदिवसीय उपवास किया। मांग है कि 2010 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों को TET से छूट दी जाए।
लेकिन इस आंदोलन ने शासन की नीति और शिक्षा की गुणवत्ता पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।
शासन की नीति स्पष्ट है – गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं
केंद्र सरकार के RTE अधिनियम 2009 और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्य की गई है। शासन का मानना है कि बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक की पात्रता सिद्ध होनी ही चाहिए। 2005-2009 में व्यापमं से भर्ती हुए हों या उससे पहले, समय के साथ शिक्षा का स्तर और चुनौतियां बदली हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 2028 तक TET पास न करने वाले शिक्षक सेवानिवृत्त माने जाएंगे।यह फैसला किसी को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए है।
सबसे बड़ा सवाल – शिक्षक ही परीक्षा से क्यों डर रहा है?
जो शिक्षक रोज क्लास में बच्चों की परीक्षा लेता है, वही आज अपनी पात्रता परीक्षा से बच रहा है।अगर 25-30 साल पढ़ाया है तो TET पास करने में डर कैसा?अगर अपनी विद्या और ज्ञान पर भरोसा है तो परीक्षा से परहेज क्यों?संघ की भीड़ और नारेबाजी से क्या अपनी अयोग्यता छुपाई जा सकती है?जिस शिक्षक को अपनी ही परीक्षा पर भरोसा नहीं, वह समाज को क्या शिक्षित करेगा? क्या ऐसे शिक्षक से हम उम्मीद कर सकते हैं कि वह डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनाएगा?
तमिलनाडु का हवाला देना गलत
शिक्षक संगठन तमिलनाडु का उदाहरण दे रहे हैं, लेकिन तमिलनाडु ने अपने यहां शिक्षकों की गुणवत्ता के लिए अलग और कड़े मानक बनाए हैं। मध्यप्रदेश में तो पहले ही शिक्षा का स्तर चिंताजनक है, ऐसे में TET से छूट देना बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।
डिंडौरी में धरने पर बैठे शिक्षकों को यह सोचना चाहिए कि समाज उनका सम्मान गुरु के रूप में करता है, आंदोलनजीवी के रूप में नहीं।
शासन का झुकना जायज नहीं
1.5 लाख शिक्षकों की चिंता जायज है, लेकिन 1 करोड़ बच्चों के भविष्य से बड़ी नहीं। जो पात्र हैं, वे परीक्षा पास कर लेंगे, जो अपात्र हैं, उन्हें हटना ही होगा – तभी सुधरेगी सरकारी स्कूलों की शिक्षा।
शिक्षकों को नहीं पुस्तकीय ज्ञान
डिंडौरी के कई स्कूलों में निरिक्षण के दौरान देखने में पाया गया है की कई शिक्षक ऐसे भी है जिन्हें जनरल नॉलेज तो दूर पुस्तकीय ज्ञान तक नहीं है,जिसका जीता जगता उदाहरण तब सामने आया था जब एक पत्रकार के के द्वारा शिक्षा की गुणवत्ता जाँच करने कुछ दिन पूर्व ही एक शिक्षक से पहाड़ा पूँछा गया था पर महोदय जी दूनिया का पहाड़ा तक सही तरीके से नहीं बोल पाए थे ऐसा है जिला डिंडौरी की शिक्षा व्यस्था, शिक्षकों की होने वाली पात्रता परीक्षा को जनमानस ने भी जायज ठहराया है।


