डिंडौरी(संतोष सिंह राठौर)-: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज हमारी दैनिक जीवनशैली का अहम हिस्सा बन गया है, लेकिन इसके अनियंत्रित उपयोग को लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक और चिंतक चिंतित हैं। तकनीक ने जीवन को सुगम तो बनाया है, लेकिन बिना नियमन के इसका उपयोग मानव की मौलिक सोच और विवेक को क्षीण कर सकता है।
मानव सभ्यता का विकास चिंतन क्षमता और रचनात्मकता से हुआ है। अत्यधिक एआई निर्भरता मनुष्य को मानसिक आलस्य की ओर ढकेल रही है। जब लेखन, समस्या समाधान और सामाजिक निर्णय पूरी तरह एआई के हवाले होंगे तो मानव मस्तिष्क की संज्ञानात्मक क्षमताएं पंगु हो जाएंगी।
दिग्गजों ने खुद जताई चिंता
यह खतरा काल्पनिक नहीं है। गॉडफादर ऑफ एआई कहे जाने वाले नोबेल विजेता जेफ्री हिंटन ने मई 2023 में गूगल के शीर्ष पद से इस्तीफा देकर कहा था कि उन्हें अपने आविष्कार के कुछ हिस्सों पर मलाल है और यह तकनीक इंसानों से ज्यादा बुद्धिमान होकर उन पर नियंत्रण कर सकती है।
इसी तरह ओपनएआई के मुख्य वैज्ञानिक इल्या सुतस्केवर ने एआई सुरक्षा और मानव मूल्यों से भटकाव को लेकर पद छोड़ा। सैकड़ों शोधकर्ताओं ने संयुक्त पत्र जारी कर कहा कि एआई के खतरे को महामारी और परमाणु युद्ध जैसे वैश्विक खतरों के समान प्राथमिकता से देखा जाना चाहिए।
सहयोगी बने, स्वामी नहीं
जैसे परमाणु ऊर्जा का उपयोग बिजली और हथियार दोनों के लिए हो सकता है, वैसे ही एआई भी है। स्वास्थ्य, चिकित्सा अनुसंधान और खगोल विज्ञान में सहायक टूल के रूप में यह हितकारी है, लेकिन जब इसे मानव चेतना की जगह स्थापित किया जाएगा तो यह नौकरियों का ही नहीं, इंसानी वजूद के अस्तित्व का संकट बन जाएगा।
तकनीक को इंसान का सहयोगी होना चाहिए, विकल्प नहीं। सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और डेवलपर्स को मिलकर इसके कड़े नियम तय करने होंगे, ताकि मशीनें इंसानी निर्देशों का पालन करें, सभ्यता पर हावी न हों।



